Sunday, 26 February 2012

घर लौट के देख जा.

तेरी नादानी से इतनी है इल्तीज़ा
इक बार घर लौट कर देख जा..
क्या खोया तूने, इस दरमियां
क्या पाने की चाहत में..
कुछ खाश नहीं तेरे घर में
बस !
इक बार घर लौट के देख जा...

-मनोज

Monday, 20 February 2012

किनारो से दूर चला.

फिर बहता हुआ.
किनारों से दूर चला,
बिन पतवार के.
खुले आसमा में यूँ चला,
सख्त जमी !
नमकीन पानी में..
तलाश करने चला,
फिर बहता हुआ.
किनारों से दूर चला....
जो भी मिला-
इन राहों में !
मिलते-मिलाते आगे बड़ा,
किनारो से दूर चला....

-मनोज-

 

Friday, 3 February 2012

ढलती उम्र की ख़ामोशी

ढलती उम्र की ख़ामोशी,
बदहवास, फिज़ाओं में घुल जाती,
जब, मेरे दादा जी की आँखों में-
बरबस ही दादी बह जाती,

पापा कहते हैं,
ये गुज़रे ज़माने की बात है,
जब दादी की आवाज़-
उनके चेहरे की रौनक हुआ करती थी,
जब बुढ़ापे की लाठी की तरह-
दादी हर वक़्त साथ रहा करती थी,
पर आज !
उनके उम्र से कोशो दूर,
दादी छुट गयी,
मिट्टी सी याद थी-
मिट्टी में मिल गयी,

बस कुछ यादें बाकी हैं,
जिनके सहारे कभी कभार,
हम भी उन्हें याद कर लेते हैं,

---मनोज



Wednesday, 1 February 2012

ऐसा कौन सा सन्देश दे ?

रात के दस बजे,
तुम्हारा सन्देश,
कि उनका जाना तय हुआ..
छोटी सी तुम्हारी बात,
और मायूसी में डूबे मेरे हालात,

इक रोज पहले ही मिला था,
किसी अजनबी की तरह उनसे,
न मैं जानता था उन्हें,
और न वो पहचानते थे मुझे,
बस दूर का रिश्ता था,
मन का, मनुष्य का,
दूर इसलिए की-
ऐसे रिश्ते पुकारे नहीं जाते,
न ही टूटे हुए माने जाते,
खेर !
उनकी ज़िन्दगी का तो अंत हुआ,
उलझनों का,
इच्छाओं का,
और बाकी इस शरीर का,
पर, मेरी एक अलग ही उलझन थी,
कि जिन्दा आदमी-
मरने वाले के लिए क्या कहें ?
ऐसा कौन सा सन्देश दे,
जिसे सुनकर मेरा दर्द उनतक पहुंचे..
--मनोज
 

Sunday, 29 January 2012

आखरी सवाल

बस आखरी सवाल है तुमसे,
कि जीने से पहले मौत का फरमान क्यूँ है ?
दीये की बाती में अंत का आभाष क्यूँ है ?
तुम तो आसमा में रहते हो-
कहते हैं, 
फिर आसमा में सुनापन क्यूँ है ?

ज़र्रा-ज़र्रा तुम्हारा है,
ज़र्रे की खवाहिश तुम्हारी है,
फिर ज़र्रे में दर्द का एहसास क्यूँ है ?

जवाब है तो दे देना,
बिना किसी तर्क के,
क्योंकि, तुम्हारा तर्क,
मेरे शारीर से परे है,
और मौत के बाद-
क्या एहसास और क्या सवाल....

---मनोज--

 

Wednesday, 18 January 2012

ऊँचें इमारत

मैं जब भी ऊँचे इमारतों को देखता हूँ,
तो मेरे सपनो का ख़र्च बड़ जाता है,
उम्मीदें हवा में उड़ती जरूर है-
पर पंख फैलाए उम्र गुज़र जाती है,
इस दिल में रोज़ नए अरमां उगते हैं,
और पुराने ढह जातें हैं ,
मैं जब भी ऊँचे इमारतों को देखता हूँ,..... 

---मनोज--

Tuesday, 10 January 2012

इक बार देखता हूँ तो..


इक  बार देखता हूँ तो..
बार-बार मन करता है..
इस बार नहीं..
ये हर बार करता है..
फिर..
कुछ तुमको याद करता हूँ,
कुछ अपने आपको.,
रोज इसी तरह..
हर बार करता हूँ,

इक  बार देखता हूँ तो.,,,,,,,,,,

धड़कने रुक जाती है..
कहते हैं लोग..
ये एहसास करता हूँ..
सो बार संभलता हूँ..
सो बार फिसल जाता हूँ 
रोज इसी तरह..
हर बार करता हूँ,

इक  बार देखता हूँ तो.,,,,,,,,,,
----मनोज--