Wednesday, 3 August 2011
Monday, 1 August 2011
बस की खिड़की से
बस की खिड़की से, वो रोज़ मेरी आँखों से टकराती है..
हाथों में फूल लिए हल्की सी मुस्काती है..
उसे मालूम है, मैं चलता राही हूँ..
आँखों से गुज़रता हुआ एक पल का साथी हूँ..
फिर भी वो हाथों में गुलाब लिए.
मेरे करीब आती है..
आँखों में फूलों की हजारों तस्वीरें..
होंटों से कुछ कह जाती है..
मैं चाहकर भी अपने को नहीं रोक पाता हूँ..
रोज़ उसके हाथों से फूल घर ले जाता हूँ..
मेरे घर में वो फूल, गुलदस्ते में सजा होता है..
और उसके घर के चूल्हे में आग जल रहा होता है ....मनोज
Wednesday, 27 July 2011
तुम्हें जाते हुए दूर तलक देखता हूँ मैं,
फिर पलटकर अपनी तन्हाई को..
ये आलम मेरी परछाई का सब्ब है,
और कुछ कहें तो राह मुश्किल है..
फिर भी ये दूरी बे-मुश्किल-
...इन्तिहाँ है,
और तुम्हारे मेरे बीच में फांसलों की ये-
बंदगी है,
शायद इसलिए !!
तुम्हें जाते हुए दूर तलक देखता हूँ मैं,
फिर पलटकर अपनी तन्हाई को..
फिर पलटकर अपनी तन्हाई को..
ये आलम मेरी परछाई का सब्ब है,
और कुछ कहें तो राह मुश्किल है..
फिर भी ये दूरी बे-मुश्किल-
...इन्तिहाँ है,
और तुम्हारे मेरे बीच में फांसलों की ये-
बंदगी है,
शायद इसलिए !!
तुम्हें जाते हुए दूर तलक देखता हूँ मैं,
फिर पलटकर अपनी तन्हाई को..
Subscribe to:
Posts (Atom)