Monday, 21 November 2011

एक बार तो पूछ लिया होता

एक बार तो पूछ लिया होता,
कि मेरे बिन तुम रहोगे कैसे ?
मेरी आदत है तुमसे, कि पूछा नहीं तुमने,
कि मेरे बिन तुम संभलोगे कैसे ?

एक जीश्म ही सांझा नहीं था अपना,
सांझी थी हर बात अपनी,
एक बार भी नहीं पूछा तुमने,
कि तुम अकेले रहोगे कैसे ?

अब तो उम्र भर आँख बहेगी,
देखकर दुनिया ये कहेगी,
तुम भी अपना मन बनालो,
आगे बढ़कर जिन्दगी संभालो,

हाय रे ! इन्हें कैसे समझाऊँ,
जीश्म है मेरा, 
रूह नहीं है,
तेरे संग वो समा गई है,
एक बार भी नहीं पूछा तुमने,
कि  बिन रूह जी पाओगे कैसे ?.....मनोज

Saturday, 19 November 2011

खुदा करे लफ़्ज़ों से निकल कर कभी तो जन्नत बाहर आ जाये,
इक बार हम भी तो देखें कि हर सफे में लिक्खी कहानी कहाँ तक सही है..,

इस फकीर को लफ़्ज़ों की लकीर में यकीं नहीं,
है दम तो एक बार आसमा से अपना चेहरा तो दिखला दो..




Friday, 18 November 2011

इश्क आईना नहीं.
जो टूट कर बिखर जाये..,
हाँ, सिलवटे जरुर आती है ज़िन्दगी में,
साथ यूँ नहीं छोड़ा करते,
उम्रभर जो तुम्हारा था दिल से..
मु की बातों से दिल  तोडा नहीं करते.
अश्क है तेरी ख़ुशी का हर सबब..
अरमानो के रूठ जाने से यूँ बहा नहीं करते..
हाँ, सिलवटे जरुर आती है ज़िन्दगी में,
साथ यूँ नहीं छोड़ा करते...


इक बार कह दे तू कि,
रुहु इश्क़ जानता है..
हाँ फिर, मैं भी कह दूँ तुझे..
इश्क़ रब मानता है...

दुनिया की तलवार, 
चाहे कितने भी हो पहरे..
राह इश्क़ की, सब रब जानता है..,

मुकम्मल इश्क़ नहीं होता...-
ये कहना छोड़ दो दरिंदो...
इश्क़ को खुदा भी अपना रब मानता है...

Saturday, 5 November 2011

इक अरमान ही तो है, अपना 
जो दिलकी बात समझता,
सुनेपन की तन्हाई में..
यादों में रश, है घोलता..
फीके-फीके सपनों को..
रंगों में यूँ  पिरोता.
डूबी डूबी शाम इश्क़ की ..
आँखों में यूँ खिलता 
इक अरमान ही तो है, अपना 
जो दिलकी बात समझता,.....मनोज

Thursday, 22 September 2011

भूल गए थे जिस सावन को,
उसकी याद आज फिर चली आई,
उन झूलों की तनी हुई आवाज़, 
पत्तों की सरसराहट,
मानो, मेरे कानो की इर्द-गिर्द.. टहल रही हो,
और कह रही हो..
कि भूले सावन आज फिर से लौटा दो,
कोई ख्वाब फिर से नया,

यूँ दिखला दो.....मनोज

नफ़रत


तुम पाल लो नफ़रत को,
गहरे अन्दर तक, 
और भी गहरे,
अपनी जिद्द  की आखरी  हद तक ,

अबकी तुम्हें नहीं मनाऊँगा,
और न ही किसी को समझाने-
तुम्हारे पास भेजुँगा,

तुम्हें करने दूँगा, हर वो प्रयास,
जिससे, तुम नीचता की हर हदें,
पार कर सको ,

दौड़ा लो अपनी शैतानी-
दिमाग के घोडे़,
जिसे तुम अपनी परम्परा मानते हो,
अपनी जागीर की तरह,
जिसको तुम चलाना चाहते हो,
उसे तुम चला लो,
दम रहने तक,
दम तुम्हारा भी,
दम उसका भी,

फिर चाहो तो तुम अपना,
मनचाहा साथ भी  ले सकते हो,
पूरी नरायणी सेना ! 
और फिर टकरा जाओं,
अपनी नफ़रत के बल से, 
मेरे प्यार की दीवार पे,

और इसके बाद भी,
तुम्हारा दिल न भरे तो,
उठा लो खंज़र,
वार करो,
जब तक मेरे खुन का-
एक भी कतरा, मेरे शरीर मंे रहे,
तब तक वार करो,
इस बिच,
मुझे  तड़पता हुआ देख,
पिघल न जाना,
नफ़रत की आग को,
ठण्डा होने न देना,
उसे और भी गर्म कर लेना,
लोहे की पिघलने वाली गर्माहट तक,
और इन सब के बाद,
जब तुम्हारा शरीर और दिमाग-
थक कर चुर हो जाए,
तो एक बार अपने -
मुर्दा शरीर की इच्छाओं को छोड़कर,
चिन्तन करना !
कि तुम क्या थे.....
और क्या हो गये......  मनोज