Friday, 18 November 2011

इक बार कह दे तू कि,
रुहु इश्क़ जानता है..
हाँ फिर, मैं भी कह दूँ तुझे..
इश्क़ रब मानता है...

दुनिया की तलवार, 
चाहे कितने भी हो पहरे..
राह इश्क़ की, सब रब जानता है..,

मुकम्मल इश्क़ नहीं होता...-
ये कहना छोड़ दो दरिंदो...
इश्क़ को खुदा भी अपना रब मानता है...

Saturday, 5 November 2011

इक अरमान ही तो है, अपना 
जो दिलकी बात समझता,
सुनेपन की तन्हाई में..
यादों में रश, है घोलता..
फीके-फीके सपनों को..
रंगों में यूँ  पिरोता.
डूबी डूबी शाम इश्क़ की ..
आँखों में यूँ खिलता 
इक अरमान ही तो है, अपना 
जो दिलकी बात समझता,.....मनोज

Thursday, 22 September 2011

भूल गए थे जिस सावन को,
उसकी याद आज फिर चली आई,
उन झूलों की तनी हुई आवाज़, 
पत्तों की सरसराहट,
मानो, मेरे कानो की इर्द-गिर्द.. टहल रही हो,
और कह रही हो..
कि भूले सावन आज फिर से लौटा दो,
कोई ख्वाब फिर से नया,

यूँ दिखला दो.....मनोज

नफ़रत


तुम पाल लो नफ़रत को,
गहरे अन्दर तक, 
और भी गहरे,
अपनी जिद्द  की आखरी  हद तक ,

अबकी तुम्हें नहीं मनाऊँगा,
और न ही किसी को समझाने-
तुम्हारे पास भेजुँगा,

तुम्हें करने दूँगा, हर वो प्रयास,
जिससे, तुम नीचता की हर हदें,
पार कर सको ,

दौड़ा लो अपनी शैतानी-
दिमाग के घोडे़,
जिसे तुम अपनी परम्परा मानते हो,
अपनी जागीर की तरह,
जिसको तुम चलाना चाहते हो,
उसे तुम चला लो,
दम रहने तक,
दम तुम्हारा भी,
दम उसका भी,

फिर चाहो तो तुम अपना,
मनचाहा साथ भी  ले सकते हो,
पूरी नरायणी सेना ! 
और फिर टकरा जाओं,
अपनी नफ़रत के बल से, 
मेरे प्यार की दीवार पे,

और इसके बाद भी,
तुम्हारा दिल न भरे तो,
उठा लो खंज़र,
वार करो,
जब तक मेरे खुन का-
एक भी कतरा, मेरे शरीर मंे रहे,
तब तक वार करो,
इस बिच,
मुझे  तड़पता हुआ देख,
पिघल न जाना,
नफ़रत की आग को,
ठण्डा होने न देना,
उसे और भी गर्म कर लेना,
लोहे की पिघलने वाली गर्माहट तक,
और इन सब के बाद,
जब तुम्हारा शरीर और दिमाग-
थक कर चुर हो जाए,
तो एक बार अपने -
मुर्दा शरीर की इच्छाओं को छोड़कर,
चिन्तन करना !
कि तुम क्या थे.....
और क्या हो गये......  मनोज

Thursday, 11 August 2011

घर से दूर

आज आँखों में कुछ नमी सी है,
लगता है घर में बारिश हो रही है,
उडती हवाओं की तबीयत ढीली सी है..,
लगता है उलझी हुई कोई पहेली सी है,
मैं घर से दूर कभी रहता नहीं..
चौराहें  में यूँ ठहरता नहीं..
आज अँधेरी हो चुकी है राहें,
लगता है घर की रोशनी कहीं दूर है.......मनोज

एक अर्शा

तुम्हें देख एक अर्शा हो गया..
न स्पर्श और नहीं ही आवाज़..
अब तो ऐसा लगता है-
तुम्हारी  यादें किसी खँडहर में  तबदील सी  हो गयी हैं,
मेरी आँखों में तुम्हारा चेहरा 
किसी पुरानी तस्वीर में पड़े धुल की तरह..
धुंधलाने लगी है..
कमजोर हो चला हूँ अपनी यादों में,
तुम्हारी पड़ी हुई, न जाने कितनी ही  यादों को,
अपनी चारपाई के नीचे बिखरे हुए देखता हूँ..
हिम्मत नहीं उन्हें समेटने की..
कहीं तुम्हारा चेहरा न दिख जाए, ये सोचता हूँ..
अब जो  बाकी है इस ज़िन्दगी में..
वो बस तुम्हें भूलने में..खर्च कर रहा हूँ.. मनोज

आख़री ख़त

शायद तुम्हारे लिए ये ख़त आख़री हो,
पर मेरे लिए तुमसे बिछुडने की शुरूआत...
दिल के हर सफे में गहरी छाप है तुम्हारी
फिलहाल ये न मिट पाएंगे...
फिलहाल इसलिए कि इसके बाद कहीं ये दिल-
धड़कना ही न बन्द कर दे...,
फिर तो जिश्म की सारी बात...
कब्रे मिट्टी हो जाएगी,
खेर!
इस उम्र में तुम्हारी ये बेरूखी..
मुझे अपनो के बीच घुटन सी लगने लगती है,
आँखें बन्द करता हूँ तो-
खेतों की पगदंडियों में,
तुम्हारे पैरों के निशान दिखने लगते हैं,
किचड़ की सोंधी-सोंधी सी  खुशबू में-
तुम्हारी महक आने लगती है,
पुरानी सारी बातें, उड़-उड़कर जा जाती है,
तन्हाई के इस आलम में मेरी सांसो को तनहा कर जाती है,
मैं जागते हुए भी सपनों में रहता हूँ,
याद बरसों की पर तुममें रहता हूँ,
अब! मेरा ये आख़री ख़त-
सिर्फ तुम्हारे लिए है,
जब तुम अमन-ए-नींद से जागो-
तो ख़त का जवाब जरूर देना,...........मनोज